यहाँ पर लिखा कुछ भी मेरा नहीं है, जो कुछ भी है समाज से लिया और समाज को ही आहूत (अर्पित) करता हूँ.

Tuesday, 21 June 2011

सरकार की प्रिंट मीडिया पर अंकुश की तैयारी!


दोस्तों आजकल समाचार पत्रों मे आ रहे एक विज्ञापन की ओर आपका ध्यान जरूर गया होगा। यह विज्ञापन आईएनएस द्वारा जारी किया गया है, जोकि बतलाता है की पत्रकारों की सैलेरी निर्धारित करने के लिया सरकार ने एक वेतन बोर्ड बनाने का फैसला लिया है। और यह बोर्ड केवल प्रिंट मीडिया के पत्रकारों की सैलेरी के बारे मे फैसला करेगा। आईएनएस ने इस कदम का विरोध किया है जो की सही भी है। क्योंकि इस कदम के पीछे सरकार की मंशा सही नजर नहीं आती है।

जैसा की हम बाबा रामदेव ओर अन्न हज़ारे के केसेस मे पहले ही देख चुके है की सरकार केवल एक सर्कुलर के द्वारा कैसे न्यूज़ चेनेल्स को नियंत्रित करती है ओर अब इस बोर्ड के द्वारा वह प्रिंट मीडिया को भी नियंत्रित करना चाहती है। क्योंकि जब एक पत्रकार को पता होगा की उसका वेतन अथवा वेतन मे वृद्धि सरकार के द्वारा निर्धारित की जाएगी तो क्या वह उस सरकार के खिलाफ कुछ भी लिख पाएगा? क्या वह पत्रकार फिर स्वतंत्र रह पाएगा? क्या उसके ऊपर हमेशा सरकार की तलवार नहीं लटकी रहेगी जैसे की अभी तक मीडिया हाऊस के मालिक की लटकी रहेती है?

लगता है यह सरकार मीडिया मैं अपने खिलाफ कुछ भी सुनना या पढ़ना नहीं चाहती है। तभी तो जहां एक तरफ वह बाबा रामदेव या अन्ना की खबरों को रोकने की कोशिश करती है,वहीं दूसरी तरफ इन दोनों के खिलाफ मीडिया मैं प्रोपोगेंडा करवाती है। कभी कहती है कि यह दोनों आरएसएस के आदमी है तो कभी कुछ। और सरकार यह सब करती है केवल इनके द्वारा उठाए गए मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए। क्योंकि यदि वे सब आरएसएस के आदमी है भी तो क्या उनके द्वारा उठाये गए मुद्दे  गलत है? क्या आरएसएस के आदमी भारतीय होने के नाते उन सब मुद्दों को नहीं उठा सकते है जो कि देशहित में है? यदि हाँ तो क्यों नहीं सरकार उनके द्वारा उठाये गये मुद्दों पर कुछ कदम उठती है और केवल उनके खिलाफ मीडिया में प्रोपोगेंडा करती है।

लगता है सरकार का उदेश्य केवल मीडिया पर आपना नियंत्रण रखने मैं है न की उपरोक्त समस्याओं के हल में। वरना वह काले धन और लोकपाल जैसे मुद्दों पर गलत बयानी नहीं करती। 

Sunday, 19 June 2011

क्या हमारे देश मे लोकतंत्र है या सिर्फ तानाशाही है।

5 जून की रात को दिल्ली के रामलीला मैदान मे जो कुछ हुआ उसे आप सभी जानते है। उसके बारे मैं लगभग सभी चेनलों और बहुत से ब्लोगस पर पक्ष और विपक्ष पर काफी दलीलें आप पढ़ और सुन चुके है। वह रात भारत के लोकतंत्र के माथे पर एक काला धब्बा है ऐसा लगभग सभी लोग मानते है। परंतु उस रात के बाद भी पर्दे के पीछे बहुत सी ऐसी घटनाएँ घाट रही हो जो भारत के लोकतान्त्रिक देश होने पर प्रश्न-चिन्ह लगाती है, उन घटनाओ के बारे मैं अधिक जानने के लिए निम्न लिंक्स पर जाएँ और फिर दूसरे लोगो को भी बताएं।

सरकार ने मीडिया को बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे की कवरेज करने से माना किया है।
बाबा रामदेव को बदनाम करने के लिए 5 दिन मे 1700 करोड़ के विज्ञापन।